BARISH KI WO PAHLI BUND.
बारिश की पहली बूंद
वो धरती का गर्मी मैं झुलसना,
अग्नि की लपटों की तरह तपना !
प्रचंड तपन को सहकर करना ,
बारिश की पहली बूंद का इंतज़ार !!
जब तार- तार होते थे कपडे,
पसीने की बूंदों से !
जब कूलर और एसी का उपयोग,
हो जाता था बेकार !!
जब प्राण प्रवहित करती धरा को ,
लवणयुक्त बारिश की बूंद !
बहुत मनोरम दृश्य थे वह ,
सब लुत्फ़ उठाते आंखें मूंद !!
इन्ही चंद बूंदों के संग,
बिखेरे हैं भोपाल में रंग !
बीत गए वो दिन, याद है सारी बातें,
पर कैसे भुलायी जा सकती है,
बारिश की वो पहली बूंद !!
- नवजीत गौरव ( पंचम वर्ष )
Comments
Post a Comment